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Sanskrit Poet-2

 © sasmitapanda


वन्दे पृथ्वीं मातरं शुभां, जीवनस्य आधारकां शुभाम्।
क्षमा स्वरूपा सदा स्थिरा, धारणाशक्तिं वहन्त्यनाम्॥

भूमिरस्य जननी सदा, सर्वभूतानां रक्षिका सदा।
जल-वायुं पुष्टिं वहति, धनधान्यं जीवनदायिनी॥

पर्वताः शिरसा भूषिताः, नद्यो माल्यं वहन्ति सदा।
वनानि हरितं शीतलं, धरणी माता शुभं करोति॥

मातः पृथिव्याः नमो नमः, क्षीरधारा त्वं सदा अमृतः।
तव चरणं नित्यं वन्द्यते, सर्वजीवनं तव कृपया॥

अर्थ:
पृथ्वी माता को प्रणाम है, जो हमारे जीवन का आधार है। वह क्षमा की मूर्ति हैं और अपनी सहनशीलता से हमें सदा स्थिरता प्रदान करती हैं। पृथ्वी माता सभी प्राणियों की रक्षक हैं, जल, वायु और अन्न की पोषिका हैं। उनके पर्वत मुकुट के समान और नदियाँ उनकी माला के रूप में शोभा पाती हैं। वन उनकी हरित चादर हैं, जो शीतलता और शांति देते हैं। हम सदा उनकी कृपा के लिए कृतज्ञ हैं।